Home छत्तीसगढ़ भक्ति में भाव होना चाहिए, प्रभाव नहीं : विवेक मोनू भंडारी

भक्ति में भाव होना चाहिए, प्रभाव नहीं : विवेक मोनू भंडारी

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डोंगरगढ़। धार्मिक आयोजनों में भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परंपराओं और सनातन संस्कारों की झलक दिखाई देनी चाहिए। भक्ति का वास्तविक स्वरूप श्रद्धा, समर्पण, सादगी और सेवा भाव में निहित है, न कि दिखावे और प्रभाव में। भक्ति भाव की होनी चाहिए, प्रभाव की नहीं। धार्मिक आयोजन हमारी आस्था के प्रतीक होने के साथ-साथ समाज को संस्कार, अनुशासन और सद्भाव का संदेश देने का माध्यम भी हैं।

ईश्वर के दरबार में सभी श्रद्धालु समान हैं। यहाँ किसी के पद, प्रतिष्ठा या विशेष पहचान से अधिक महत्व उसकी श्रद्धा और समर्पण का होना चाहिए। इसलिए धार्मिक आयोजनों में VIP संस्कृति के बजाय समानता और सरलता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें सामान्य श्रद्धालुओं को असुविधा न हो और सभी को सम्मानपूर्वक एवं सुविधाजनक दर्शन का अवसर मिले। सुरक्षा और आवश्यक व्यवस्थाएँ अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अनावश्यक दिखावे और विशेषाधिकारों से बचना चाहिए।

इसके साथ ही धार्मिक आयोजनों को नशामुक्त बनाए रखना भी हम सभी की सामाजिक जिम्मेदारी है। शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन व्यक्ति के स्वास्थ्य, परिवार और सामाजिक वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। नशे के कारण कई बार विवाद, अनुशासनहीनता और दुर्घटनाओं की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए धार्मिक स्थलों एवं आयोजन परिसर में नशे से दूर रहकर आयोजन की पवित्रता, शांति और गरिमा बनाए रखनी चाहिए। आयोजकों एवं श्रद्धालुओं से अपील है कि नशामुक्त वातावरण बनाने में सहयोग करें और युवाओं को नशे से दूर रहकर भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों से जुड़ने के लिए प्रेरित करें।

हमारी पारंपरिक वेशभूषा, विनम्र व्यवहार और संयमित आचरण हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। धार्मिक आयोजनों में भव्यता और प्रदर्शन से अधिक महत्व श्रद्धा, सेवा, अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों को दिया जाना चाहिए। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करना नहीं, बल्कि भक्ति के वास्तविक स्वरूप को प्रोत्साहित करना और धार्मिक आयोजनों को सादगी, समानता एवं नशामुक्त वातावरण का उदाहरण बनाना है।

हमारा स्पष्ट संदेश है भक्ति में भाव हो, दिखावा नहीं; व्यवस्था में समानता हो, VIP संस्कृति नहीं; आचरण में संस्कार हों और धार्मिक आयोजन पूर्णतः नशामुक्त हों।

आइए, हम सभी मिलकर अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं का सम्मान करें तथा ऐसे धार्मिक आयोजनों को प्रोत्साहित करें, जहाँ श्रद्धा सर्वोपरि हो, प्रत्येक भक्त को समान सम्मान मिले और समाज को सकारात्मक संदेश प्राप्त हो।

“भक्ति में सरलता हो, वेशभूषा में संस्कृति हो, व्यवहार में संस्कार हों और धार्मिक आयोजनों में VIP संस्कृति एवं नशे के लिए कोई स्थान न हो।”